भाद्रपद शुक्ल अष्टमी: आंतरी का 1170 वर्ष प्राचीन मां पपलाज मंदिर श्रद्धालुओं से गुलजार
जयकारों और लोकगीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
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आस्था | 31 Aug 2025
लालसोट (आंतरी घाटा)।
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी पर आंतरी क्षेत्र का 1170 वर्ष प्राचीन मां पपलाज मंदिर आस्था और श्रद्धा का केंद्र बना रहा। पहाड़ की गुफाओं से होते हुए हजारों पदयात्री माता के दरबार में पहुंचे। जयकारों और लोकगीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
इतिहास और मान्यता
किंवदंती के अनुसार इस मंदिर की स्थापना लगभग 1170 वर्ष पूर्व मानी जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मां पपलाज स्वयंभू रूप में प्रकट हुई थीं। उनकी मूर्ति न किसी ने गढ़ी और न ही स्थापित की, बल्कि यह चमत्कारिक रूप से प्रकट हुई मानी जाती है।
चमत्कारी कुई और आस्था
मंदिर परिसर में स्थित छोटी कुई (कुएं जैसी जलधारा) का जल कभी सूखता नहीं। मान्यता है कि इस जल से स्नान करने पर चर्म रोग दूर हो जाते हैं। गूंगे, बहरे, अंधे, लकवाग्रस्त और संतानहीन भक्त यहां मन्नत मांगते हैं और मां की कृपा से कष्टमुक्त होते हैं।
अष्टमी पर भक्तों का रेला
रविवार को अष्टमी पर मंदिर में दिन-रात श्रद्धालुओं का रेला लगा रहा। राजोली, इनदावा, डिगो, गोल, खठूमर सहित सैकड़ों गांवों से पैदल यात्री पहुंचे। कई श्रद्धालु कनक दंडवत यात्रा करते हुए भी माता के दरबार में पहुंचे। मंदिर परिसर नगाड़ों, मंजीरों और लोकगीतों से गूंज उठा।
बरसात और व्यवस्थाएं
बरसात के चलते बहन के नाले में पानी आने से कई बार पदयात्रियों को रुकना पड़ा। वहीं, भारी भीड़ के चलते जाम जैसे हालात बने। पुलिस प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिलकर यातायात व सुरक्षा व्यवस्था संभाली।
परंपराएं और अनुष्ठान
यहां नवविवाहित जोड़े पांच गीत सुनकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर बच्चे का मुंडन संस्कार यहीं संपन्न होता है। मन्नत पूरी होने पर भक्त दाल-पुआ और खीर का भंडारा कर मां को भोग लगाते हैं।
भंडारे और स्वागत
पदयात्रियों का जगह-जगह स्वागत हुआ। ग्रामीणों ने प्याऊ और प्रसादी के साथ भंडारे का आयोजन किया। महिलाएं मेहंदी और श्रृंगार सामग्री की खरीदारी करती नजर आईं तो बच्चे खिलौनों व मिठाइयों में मग्न रहे।
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी पर आंतरी क्षेत्र का 1170 वर्ष प्राचीन मां पपलाज मंदिर आस्था और श्रद्धा का केंद्र बना रहा। पहाड़ की गुफाओं से होते हुए हजारों पदयात्री माता के दरबार में पहुंचे। जयकारों और लोकगीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
इतिहास और मान्यता
किंवदंती के अनुसार इस मंदिर की स्थापना लगभग 1170 वर्ष पूर्व मानी जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मां पपलाज स्वयंभू रूप में प्रकट हुई थीं। उनकी मूर्ति न किसी ने गढ़ी और न ही स्थापित की, बल्कि यह चमत्कारिक रूप से प्रकट हुई मानी जाती है।
चमत्कारी कुई और आस्था
मंदिर परिसर में स्थित छोटी कुई (कुएं जैसी जलधारा) का जल कभी सूखता नहीं। मान्यता है कि इस जल से स्नान करने पर चर्म रोग दूर हो जाते हैं। गूंगे, बहरे, अंधे, लकवाग्रस्त और संतानहीन भक्त यहां मन्नत मांगते हैं और मां की कृपा से कष्टमुक्त होते हैं।
अष्टमी पर भक्तों का रेला
रविवार को अष्टमी पर मंदिर में दिन-रात श्रद्धालुओं का रेला लगा रहा। राजोली, इनदावा, डिगो, गोल, खठूमर सहित सैकड़ों गांवों से पैदल यात्री पहुंचे। कई श्रद्धालु कनक दंडवत यात्रा करते हुए भी माता के दरबार में पहुंचे। मंदिर परिसर नगाड़ों, मंजीरों और लोकगीतों से गूंज उठा।
बरसात और व्यवस्थाएं
बरसात के चलते बहन के नाले में पानी आने से कई बार पदयात्रियों को रुकना पड़ा। वहीं, भारी भीड़ के चलते जाम जैसे हालात बने। पुलिस प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिलकर यातायात व सुरक्षा व्यवस्था संभाली।
परंपराएं और अनुष्ठान
यहां नवविवाहित जोड़े पांच गीत सुनकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर बच्चे का मुंडन संस्कार यहीं संपन्न होता है। मन्नत पूरी होने पर भक्त दाल-पुआ और खीर का भंडारा कर मां को भोग लगाते हैं।
भंडारे और स्वागत
पदयात्रियों का जगह-जगह स्वागत हुआ। ग्रामीणों ने प्याऊ और प्रसादी के साथ भंडारे का आयोजन किया। महिलाएं मेहंदी और श्रृंगार सामग्री की खरीदारी करती नजर आईं तो बच्चे खिलौनों व मिठाइयों में मग्न रहे।